Posts

छठ महापर्व : नारी शक्ति की पूजा, एपिसोड:- 66

Image
सांस्कृतिक पृष्टभूमि में आर्यों की #सूर्योपासना की शास्त्रोक्त परम्परा से कुछ भिन्न रूप में सूर्य के #सविता रूप की पूजा शुरू हुई। ऋग्वेद में सूर्य को “जगत की आत्मा” कहा गया है। जबकि सूर्योपनिषद में सूर्य को ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का ही रूप कहा गया है। भारतीय समाज मे शुरू से ही सूर्य को आरोग्य प्रदान करने वाला एक प्रत्यक्ष देवता माना जाता रहा है। भारतीय परम्परा के अनुसार सूर्य की दो पत्नियां हैं - ऊषा और प्रत्युषा, सूर्य की पत्नी होने के साथ उनकी दो प्रमुख शक्तियां भी हैं। सूर्य-षष्ठी के अवसर पर मनाए जाने वाले लोकपर्व को छठ पर्व कहा जाता है। छठ, दरअसल,सूर्यदेव की उपासना के कहीं अधिक उनकी शक्तियों की उपासना का एक लोकपर्व है।  प्रमुख रूप से सूर्यदेव की दोनों शक्तियों ऊषा एवं प्रत्युषा की उपासना किये जाने के कारण सूर्य-षष्ठी पर्व को समान्यतः “छठ मैया की पूजा” के नाम से जाना जाता है।  ऋग्वैदिककाल से ही 'छठ मैया' लोककल्याणकरी देवी के रूप में पूजी जाती रही है। कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हुए छठ-व्रती सूर्य व प्रत्य...

हिंदुत्व’ और ‘हिन्दू धर्म’

Image
‘हिंदुत्व’ और ‘हिन्दू धर्म’  एपिसोड:-65 हिंदुत्व एक ऐसा शब्द है, जो संपूर्ण मानवजाति के लिए आज भी असामान्य स्फूर्ति तथा चैतन्य का स्रोत बना हुआ है।   ‘हिंदुत्व’ कोई सामान्य शब्द नहीं है। यह एक परंपरा है। एक इतिहास है। यह इतिहास केवल धार्मिक अथवा आध्यात्मिक इतिहास नहीं है। अनेक बार ‘हिंदुत्व’ शब्द को उसी के समान किसी अन्य शब्द के समतुल्य मानकर बड़ी भूल की जाती है। वैसा यह इतिहास नहीं है। वह एक सर्वसंग्रही इतिहास है। ‘हिंदू धर्म’ यह शब्द ‘हिंदुत्व’ से ही उपजा उसी का एक रूप है, उसी का एक अंश है…।  यहां इतना बताना ही पर्याप्त होगा कि ‘हिंदू धर्म’ से समान्यतः जो बोध होता है, वह ‘हिंदुत्व’ के अर्थ से भिन्न है। किसी अध्यात्मिक अथवा भक्ति संप्रदाय के मतों के अनुसार निर्मित अथवा सीमित आचार-विचार विषयक नीति-नियमों के शास्त्र को ही ‘ हिंदू धर्म ’ कहा जाता है। ‘ धर्म ’ शब्द का अर्थ भी यही होता है। ‘ हिंदुत्व ’ शब्द में एक राष्ट्र तथा हिंदू जाति के अस्तित्व का तथा पराक्रम के सम्मिलित होने का बोध होता है। इस शब्द ने लाखों लोगों के मानस को किस प्रकार प्रभावित...

अनेकान्तवाद

Image
अनेकान्तवाद ,  एपिसोड–64 अनेकान्तवाद दर्शन की उपादेयता यह है कि वह मनुष्य को दुराग्रही होने से बचाता है, उसे यह शिक्षा देता है कि केवल तुम ही ठीक हो, ऐसी बात नहीं; शायद, वे लोग भी सत्य ही कह रहे हों, जो तुम्हारा विरोध करते हैं। यह दर्शन मनुष्य के भीतर बौद्धिक अहिंसा को प्रतिष्ठित करता है, संसार में जो अनेक मतवाद फैले हुए हैं, उनके भीतर सामंजस्य को जन्म देता है, तथा वैचारिक भूमि पर जो कोलाहल और कटुता उत्पन्न होती है, उससे विचारकों के मस्तिष्क को मुक्त रखता है। अपने ऊपर एक प्रकार का विरल संदेह, विरोधी और प्रतिपक्षी के मतों के लिए प्रकार की श्रद्धा तथा यह भाव कि कदाचित प्रतिपक्षी का मत ही ठीक हो, यह एक अनेकान्तवादी मनुष्य के प्रमुख लक्षण हैं। गाँधी जी कहते हैं ; चूंकि अनेकान्तवाद से परस्पर विरोधी बातों के बीच सामंजस्य आता है तथा विरोधियों के प्रति भी आदर की वृद्धि होती है, मेरा अनुभव है कि अपनी दृष्टि से मैं सदा सत्य ही होता हूं किंतु, मेरे इमानदार आलोचक तब भी मुझमें गलती देखते हैं। पहले मैं अपने को सही और उन्हें अज्ञानी मान लेता था। किंतु अब मैं मानता हूं कि अपनी-अपनी जगह...

सुनो! सुनना जरूर (कविता संग्रह)

Image
सुनो! सुनना जरूर    एपिसोड-63 सुनो.! तुम्हीं से कह रहा सुना है कभी, झरने की आवाज, पत्तों की खड़खड़ाहट, पक्षियों की चहचहाहट, सुनना कभी ये भी कुछ कहते हैं ऐसे सुनना जैसे फिर न सुनना पड़े डूब कर सुनना उन तरंगों में सुनना ऐसे जैसे खो जाना स्वरों में की वो तुमसे ही कुछ कह रहे हों हाँ, तुमसे हीं तुम सुनोगे उसकी वेदना उसकी छटपटाहट उसकी उद्विग्नता की जैसे कहीं  स्वयं को समर्पित करने की चाह भरी हो उसमें उसके रोम-रोम जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहे हों किसी का अंश उसमें रह गया हो जैसे कोई पुकारता जैसे उसी अंतहीन तरंगों  के उद्गम स्थल को ढूंढती कह रही हो, झरने पत्ते पक्षी की अकुलाहट जैसे एक नाद में हीं सबकुछ कह देना चाह रही हो, सुनना, जरूर सुनना जब सुनोगे (डूबकर) तो जानोगे  हर कोई किसी को पाने के लिए ही अनवरत अनहद अविराम चल रहा है की अगले कदम वो मिल जाएगा जिसकी आश है। सुनो.! तुम्हीं से कह रहा जरूर सुनना जो कुछ सुनना उस अनकहे को मुझसे कहना की मैं समझ दूँ उन स्वरों को उन तरंगों को क्योंकि… मैं सुनता हूँ अक्सर सुनता हूँ जब भी अकेला तुम्हें सोचता हूँ सोचता हूँ, मेरा कह...

करमुक्त साहित्य

Image
करमुक्त साहित्य : एपिसोड- 62 साम्प्रदायिक, धार्मिक व जातिगत कट्टर उन्माद के कारण लोग अपने मूल अधिकार, कर्तव्य व मानवीय गुणों को भूलते जा रहे हैं जोकि मानव-सभ्यता की पीढ़ी-दर-पीढ़ी गतिशीलता व अनवरतता के लिए भयावह हैं। मुझे नहीं पता कि आज लोग सही-गलत में फर्क करना भूलते जा रहे हैं या फर्क करना नहीं चाहते या फिर फर्क करने से डरते हैं। सबसे बड़ी बिडम्बना आज के साहित्य जगत के नवोदित साहित्यकारों की है, उनकी कलम रचना से पहले सामुदायिक रूप से अपना एक सामाजिक पक्ष निर्धारित कर लेते हैं, जिससे उनकी लेखनी सर्वस्वीकार्य नही रह जाती, पढ़कर एक पक्ष खुश होता है तो दूसरा पक्ष आहत। वो ऐसा क्यों करते हैं, ऐसा करने पर उनके किस हितों की पूर्ति होती है.. वगैरह..वगैरह...लेकिन जो भी हो,सामाजिक समरसता सूखती जा रही है। हालाँकि हमारे साहित्यिक जगत के पूर्वजों की रचना आज भी बहुत अच्छी स्थिति में उपलब्ध है,जो आज भी मानवीय मूल्यों का संवर्धन करते हैं, जिसे पढ़कर लोगों में वर्तमान परिदृश्य पर चिंतन व सही राह समायोजन की वृत्ति जीवंत होती हैं। लेकिन व्यवसायिक हितों के कारण आमजन तक ऐसे साहित्यिक कृतियों ...

समाज और सवाल : नारी अस्मिता

Image
समाज और सवाल : नारी अस्मिता ,  एपिसोड- 61 आये दिनों हर रोज महिलाओं के शोषण व दुष्कर्म की घटनाओं ने मानवता व जीने के लिए जरूरी आदर्शों को ताड़-ताड़ कर रही हैं। इस घटनाओं में नृशंसता की वृत्ति बढ़ती जा रही है। शोषित और शोषक के उम्र को लेकर हमारा समाज विह्वल है।  ऐसे में हमे समाजिक व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन पर विस्तृत सामाजिक सर्वेक्षण की जरूरत है। कुछ सवाल हैं मेरे मन मे जो हर समाज में जाकर वहां रह रहे लोगों से उनके उत्तर जानने चाहिए जिससे तथाकथित समाज की दिशा और दशा का आकलन हो सके; इतनी कम उम्र में ऐसे विभत्स वारदात को अंजाम देने की सोच का पोषण कहाँ से मिल रहा है.?? इस घृणित अपराध के अपराधियों को तो त्वरित सजा मिले हीं,साथ ही सम्बंधित समाज की भी सोशल ऑडिट हो कि; *वो अपने बच्चों का पोषण कैसे करते हैं? *समाज के पुरुष समाज मे चौक-चौराहे पर, गली मोहल्ले में संवाद की क्या शैली है? *समाज में युवा की गतिविधि कैसी है, उनकी रुचि किस कार्यों में है? *मोबाइल नेटवर्किंग साइट्स का उपयोग समाज में किस प्रकार हो रहा है? *लोग अपने बच्चों के गतिविधियों का मूल्यांकन कैसे करते हैं? *समाज के पुरुष (ब...

आदर्शों का आत्मबोध

Image
आदर्शों का आत्मबोध ,  एपिसोड: 60 कभी-कभी मेरे मन मे आता है कि वर्तमान में भौतिक विकास के सभी कार्य रोक देने चाहिए जैसे सड़क निर्माण, नए पुल-हवाई अड्डे, प्राकृतिक तेल सोधन/भूमि उत्खनन व अन्य और इसमें लगे लोगों को समाज मे व्याप्त विकृतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, नैतिकता, मानव-आदर्शों के प्रति आत्मबोध के प्रति जागरूक करने में लगा दें और सरकार व जुड़ी संस्थाएं केवल लोकहित हेतु बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा व सुरक्षा के लिए काम करें। क्योंकि ऐसा महसूस हो रहा है कि आजादी के बाद लगातार 75 वर्षों से विकास के काम करते-करते लगभग हर संस्थायें थक गई हों और जुड़े लोगों की मति मारी गई है। ऐसी परिस्थितियों में वैसे लोग,जिनका मन-कर्म-वचन दिन-रात जनहित के प्रति ओतप्रोत होता है,वो बड़ी असमंजस के साथ जीते हैं। जो लोग समाज व पारिस्थितिकी की जटिलताओं को समझते हैं, वे अपने सम्बोधन,लेखन व अन्य गतिविधियों से समाज व सरकार को आगाह करते रहते हैं, पर सिस्टम सुधरता ही नहीं।

टेलीविजन : एक विकृति

Image
अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष,   एपिसोड–65 लोग यदि 'टेलीविजन' देखना बन्द कर दें तो मुझे लगता है कि वर्तमान समाज में जो भयावह स्थिति बनी है, उस(भयावहता: राजनीतिक, सामाजिक व अन्य)में तत्क्षण आधे की गिरावट आएगी Tv सभी समाजिक विकृतियों की जड़ बनती जा रही है। यह घर-घर―जन-जन में स्वयं व परस्पर संवाद-विमर्श की परम्परा, आकलन, दूरदर्शिता, खुद में निर्णय लेने की क्षमता आदि सामाजिक का गला घोंट रही है, बदले में यह अकेलापन, अति-अनुकरण की आदत, अनेक बीमारियों को आमंत्रित करता है। Tv से मनोरंजन कम, जन-जन में सामाजिक/पारिवारिक विकृति ज्यादा आ रही है। आज हर कोई समय की कमी से जूझ रहा है, ऐसे में tv रोज हर किसी का कम-से-कम 3-4 घण्टे बर्बाद कर रहा है। #स्मार्टफोन टीवी का हीं चलंत स्वरूप है। ऑनलाइन (इलेक्ट्रॉनिक) सूचना की विश्वसनीयता भी संदेह के दायरे में रहती है, क्योंकि हर-कोई किसी खास एजेंडे के लिए कार्य कर रहा है। सूचना के लिए समाचार पत्र   व रेडिये अभी भी विश्वसनीय हैं। आज समाजिक परिदृश्य इतनी बदतर हो चुकी है की यदि हम सोचें कि केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था, कार्यपालिका व न्यायपालिका निय...

हमारे समय के बुद्धिजीवी

Image
अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष,  एपिसोड-64 कितना असभ्य हो चला है समाज... शर्म नाम की कोई चीज नहीं रह गई, मूर्ख तो मूर्ख, पढ़े-लिखे साहित्यकार-इतिहासकार टाइप लोग भी पीछे नहीं..भविष्य के लिए कैसा समाज बना रहे हैं ये बुद्धिजीवी-विचारक. समाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए सभ्य-शालीन-सटीक व प्रभावी अवरोध की भी कला होनी चाहिए, नहीं तो पढ़े-लिखे व अनपढ़ में क्या विभेद.. समाज में विसंगतियां सामाजिक व्यवस्था के शुरुआती से ही होती रही हैं, आज का समाज उसी तत्कालीन समाज में क्रमवार सुधार का फलस्वरूप है। वर्तमान सामाजिक विसंगतियों में (खुद को) तथाकथित समाज सुधारक (कहने वाले), कुछ अपवाद स्वरूप सज्जन को छोर दें,( क्योंकि अच्छे अथवा बुरे लोग समाजिक व्यवस्था से पूरी तरह खत्म नहीं होते ) तो समाज सुधार के नाम पर बड़ी-नग्न अभिव्यक्ति करने से परहेज नहीं करते, इससे समाज में सुधार हो न हो, विसंगतियों का और प्रसार ही हो जाता है, भई यदि आप समाज सुधार हेतु सभ्य सामाजिक स्वीकार्य तरीके को अपनाने में अक्षम हैं (या विसंगति का आनन्द लेते हैं अथवा उसकी आढ में खुद की भड़ास निकलते हैं ) तो आप रहने दीजिए, समाज खुद कोई न ...

हमारा समाज और धार्मिक स्वीकार्यता

Image
#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष ; #एपिसोड_63 आज धर्म के नाम पर जो नफ़रतें बढ़ती जा रही हैं, सभ्य और समरस समाज में शांति, सौहार्द व साम्य की सार्थकता को समझने व सोचने वाले सज्जनों, चाहे वो किसी भी धर्म के मानने वाले हों, की चिंता को बढ़ाने वाली है। मैं हिन्दू हूँ और मेरे हिंदुत्व में किसी भी जीवमात्र के लिए घृणा, अपकार, अहित, उपहास व बदले की भावना नहीं है। मैं जितना अपने हिंदुत्व को मानता हूँ, उतना हीं अन्य धर्मों को मानने वाले सज्जनों को मानता हूँ। क्योंकि हरेक धर्म अपने मे आस्था रखने वाले जनों में शांति, त्याग, अहिंसा और प्रेम का हितोपदेश देता है। आज जरूरत है सभी धर्मों को गहराई से समझने की।  इस्लाम अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘शांति में प्रवेश करना’ होता है। अतः मुस्लिम वह व्यक्ति है, जो ’“परमात्मा और मनुष्य के साथ पूर्ण शांति का सम्बंध” रखता हो। अतएव, इस्लाम शब्द का लाक्षणिक अर्थ होगा–वह धर्म जिसके द्वारा मनुष्य भगवान की शरण लेता है तथा मनुष्यों के प्रति अहिंसा एवं प्रेम का बर्ताव करता है। हजरत मुहम्मद साहब इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हुए। मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म सोचकर ...

हमारी कविता संग्रह : आपकी दीद, मेरी ईद ; ईद मुबारक

Image
मेरी कविता संग्रह ; #अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष ; #एपिसोड_62 “आपकी दीद, मेरी ईद” जबजब आपकी दीद होती है, तबतब मेरी ईद होती है आपको पता है.!! दिन में छप्पन बार मेरी ईद होती है यूँ तो एक पल के लिए भी दूर नहीं हुआ आपसे लेकिन ब्रह्मानन्द होती है जब आपकी दीद होती है आपको पता है.!! दिन में छप्पन बार मेरी ईद होती है लोग चाँद की उपमा देते हैं, चँदा कहते हैं प्रेयसी को मुझे चाँद भी फीका लगता है, जब आपकी दीद होती है आपको पता है.!! दिन में छप्पन बार मेरी ईद होती है लोग सब्र करते हैं औ रोजा रखते हैं, चाँद देखने के लिए हमारी तो तब ही ईद होती है, जब आपकी दीद होती है आपको पता है.!! दिन में छप्पन बार मेरी ईद होती है

मेरी कविता संग्रह : घुटता चंद, विह्वल चकोर

Image
हमारी कविता संग्रह से ; #अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष ; #एपिसोड_61 “घुटता चाँद, विह्वल चकोर” विह्वल हो जाता हूँ विस्मृत औ व्यथित हो जाता हूँ जब बादलों में छुपे चाँद को घुटते हुए देखता हुँ अपने हाथों से बादलों को एकतरफ कर देने की कोड़ी कल्पना, तेज हवाएं चलने की उद्विग्न कामना दिल से जब बादलों में छुपे चाँद को घुटते हुए देखता हुँ… यूँ तो बहुत देखे बादलों में उगते और डूबते चाँद को, पर अब विचलित सा हो जाता है मन जब बादलों में छुपे चाँद को घुटते हुए देखता हुँ... सुनसान रातें, तारों का पहरा उसपर वो अकेला चाँद, उसकी आकुलता, उसकी व्यथा कोई आकुल ही जाने जब बादलों में छुपे चाँद को घुटते हुए देखता हुँ… क्यूँ बदल घिरता, क्यूँ काली घटा छाती? यह सोच-सोच के चाँद बेचारा घटता-बढ़ता रहता आकर में जब बादलों में छुपे चाँद को घुटते हुए देखता हुँ… चाँद की पीड़, चाँद का दर्द चाँद का भटकना काली रातों में, कोई क्या जाने, कोई क्या माने सिसकते चकोर की तितिक्षा जब बादलों में छुपे चाँद को घुटते हुए देखता हुँ…

यूक्रेन-रूस विभीषिका और भारतीय चिकित्सा प्रबंधन : एक विमर्श

Image
अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष : एपिसोड - 60 वर्तमान समय में रूस और यूक्रेन के बीच संप्रभुता की लड़ाई चरम पर है। पूरा वैश्विक समुदाय इस अनावश्यक विध्वनकारी  युद्ध से आहत है। समूची वैश्विक संस्थागत इकाई, जो सभी देशों की सहमति से विश्व कल्याण के लिए बनाए गए थे,इस विभीषिका को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ है।  इस विध्वंसक विभीषिका  ने समूचे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अभी-अभी दुनिया ने पिछले 2 साल से कोरोना महामारी की विभीषिका से अनगिनत स्वजनों को असमय कालकवलित होते देखा है। धरती पर शायद ही कोई ऐसा आदमी हो जिसने अपने परिचितों को इस महामारी में न खोया हो। ये वैश्विक आपदा में मरने वाले लोगों की सही गणना शायद ही किसी भी देश ने सही-सही सार्वजनिक की हो, कारण जो भी हो।  कोरोना महामारी का असर थोड़ा बेअसर हुआ ही था कि रूस यूक्रेन के बीच संपूर्णता की लड़ाई ने प्रलयंकारी रूप ले लिया है। इस विभीषिका ने पूरा मानव समुदाय आहत है। इस युद्ध का परिणाम जिसके पाले आए लेकिन हर रोज मानवता घुट घुट कर मर रहे हैं। यूक्रेन से लाखों लोगों का पलायन जारी है, कारण है युद्ध से अपने स्वजनों...

नारी अस्मिता और मूकदर्शक पुरुष समाज

Image
अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष  एपिसोड_59 वैदिक युग में नारियों का बड़ा ही पूजनीय स्थान था. विवाह के अवसर पर वधू को आशीर्वाद देने के लिए ऋग्वेद में जो मंत्र है, उसमें वधू से कहा गया है कि सास, ससुर, देवर और ननद की तुम साम्राज्य बनो. स्त्रियां तो गृहस्वामिनी तो होती ही थी, किंतु उनका कार्यक्षेत्र केवल घरों तक ही सीमित नहीं था. वेद की कितनी ही ऋचाऐं नारियों की रची हुई हैं. नारियों के प्रति अन्याय न हो, वे शोक न करें, न वे उदास होने पाए, यह उपदेश मनुस्मृति ने बार-बार दिया है ; शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥ अर्थात : जिस कुल में नारी शोक-मग्न रहती है, उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है. जिस कुल में नारियाँ शोकमग्न नहीं रहती, उस कुल की सर्वदा उन्नति होती है. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:॥ अर्थात : जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं. जहां नारियों की पूजा नहीं होती, वहाँ के सारे कर्म व्यर्थ हैं. वैदिक युग की इस शुभ परंपरा की अनुगूँज हम पुराणों में ...

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_58

Image
हमारी कविता संग्रह ; “ बता दीजिए हमें ” चाहने वालों से छुप-छुप के क्या छुपाना,, बता दीजिए हमें भी दिलों में क्या है आपके यूँ न खामोश रहकर तड़पाइये मुझे पल-पल हम भी तो कहेंगे आपसे अपने दिल की बातें बता दीजिए हमें… ये वादियाँ, ये सरहदें, ये दुरियाँ-खामोशी भी क्या खूब है आपका हर पल मुस्कुराना भी बता दीजिए हमें… मेरी खामोशी-बेसब्री मेरे सब्र की इंतहा है राज की बातें हमराज से यूँ छुपाना कैसा बता दीजिए हमें… कुछ दिन से चुप हैं,यूँ खामोश बेवजह आप बयां करने से भी दिल का बोझ कम होता है बता दीजिए हमें… मेरे करीब आइए मुझसे कहिए कानों में हौले यूँ गैर सुन लेंगे तो बात पर बात बन जाएगी बता दीजिए हमें… हम हैं, आप हैं  और  हैं  ये शुष्क फिजाये इतने नाराज किस बात पे हैं, राज क्या है बता दीजिए हमें… आपको ही सुनता, आपको  ही  पढ़ता  हूं ये काम छुप-छुप के करके तंग आ गया हूँ बता दीजिए हमें… #गुजारिश   #बेसब्री   #आशाएं

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_57

Image
हमारी कविता संग्रह; “ राही राहों में ” बढ़ रहे हैं मंजिल की ओर राहें बहुत दलदली हैं शुष्क फिजायें भी गिरने का भी डर रफ्तार तेज करूँ तो पाँव जमीं में धस जाते जैसे कींचड़ में पैर रफ्तार धीमी करूँ तो दिल में बेचैनी भी होती है क्या करूँ बड़ी उलझन है ले लील भले ही राह मुझे लौटना नहीं स्वीकार मुझे  - बड़ी विस्मय की बात ये बड़ी अनोखी है बात ये वादे किये,न फिरूँ पीछे हिम्मत है,न तकूँ पीछे भले हीं कुछ देरी हो, चिंता भी हो पर सफर की शाम मंजिल पे हीं हो जीवन की राहें ऐसी भी कहीं काँटे,कहीं कंकड़ भी सफर में रही अब सोचे क्या मंजिल की धुन,चिंता क्या राही राहों में घबराना ना #आशा   #अपनापन   #बेचैनी   #क्षुधा

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_56

Image
हमारी कविता संग्रह ; " आपबीती " जल था तरल था अविरल था बहा करता था सबके   अंतर   में  अपनों के अपनेपन में वेदनाओं की ठिठुरती ठंडक ने बर्फ बना डाला अचल, नुकीला सा निर्जन सा पड़ा हुआ किसी कोने में, बागों में पत्तों तले, किसी राही के पैरों तले जाने-अनजाने किसी कोमल पैरों को ठोकर लगी खून बहे, चीख उठा वो पत्थर हो क्या..!! जटिल.! कायर..! स्वार्थी.! सुनता रहा मौन हो मैं मौन पड़ा सुनता रहा सबकुछ जो प्रिय नहीं था आक्रोश थी, दर्द था शब्दों में कसक थी पहले से पीड़ा से भरा था वो भी, हाँ वो भी काश मेरे भी मौन को कोई सुन लेता, पढ़ लेता जीवन मे सब मिलते हैं पढ़े-लिखे विद्वतजन पर मेरे सम्मुख आते हीं अनपढ़ से हो जाते हैं कोई न पढ़ पता मेरे मौन को सचमुच अनपढ़.! भावनाशून्य.! तटस्थ..! उदासीन.!! क्या सच मे मित्रवत- मानवीय भावनाएं नहीं.!! अचंभित था मैं, उनके शब्दों से नहीं उसमे छिपी संवेदनाओं से कितना दर्द छुपा था अपनों के लिए उसके मन में घायल थी हो दिल के हर कोने से सभी तृष्णा को समेटे आकाश की ओर देखती कपकपाते होठ बुदबुदा रहे थे “रहम करो खुदा रहम…” मुझे तरस आई खुद पर खुद के पत्...

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_55

Image
एक बहुत ही प्यारा सा गजल ; ♥️🌹 वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो “मोमिन ख़ाँ मोमिन” वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो वही या'नी वा'दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वा'दा था सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो कहा मैं ने बा...

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_54

Image
हमारी कविता संग्रह : उफ्फ मेरा चाँद न जाने कितनों को दीवाना बनाएगा कभी दीवाना हुआ बादल कभी दीवाने हुए कायल उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कितनों को भला तड़पायेगा कभी यह घन में छुपता कभी यह मन में छुपता उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कौन सी पीड़ को छुपाता दिल में कभी इसका आकार घटता-बढ़ता कभी तन पे में काला धब्बा दिखता उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कौन सी अदा है इसके फलक पर कभी इसमें महबूब नजर आए कभी इसमें महबूबा नजर आए उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कब तृप्त होंगे मन भी नयन भी कभी कोई चकोर रात भर तकता  कभी दीवाना दिनभर आहें भरता उफ्फ मेरा चाँद… न जाने मेरे चाँद को किसकी नजर लगी कभी अमावस की रात होती है कभी नभ में बदल घुमड़ते हैं उफ्फ मेरा चाँद… न जाने चाँद के चांदनी की शीतलता मिलेगी कभी बरगद के पेड़ों से ओझल होती हैं कभी वो बदल के पीछे छुप जाती है उफ्फ मेरा चाँद…

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_53

Image
हमारी कविता संग्रह : “आपसे बिछड़े तो…” आपसे यदि बिछड़े तो, हम खूब रोया करेंगे जब भी याद आएंगे आप, हम पुकारा करेंगे बड़े बेबस, लाचार और मजबूर हैं अभी हम तो क्या कहूँ आपको कहने से और उलझ जाएंगे आपसे यदि बिछड़े तो… समय से पीछे होने की सजा वक्त न दे मुझको आपसे बिछड़ के किसी और के भी न हो पाएंगे आपसे यदि यदि बिछड़े तो… आप सा हमसफर न मिला न मिल सकेगा मुझे आप सोचिए भला आपके बगैर कैसे जी पाएंगे आपसे यदि… आप हैं, हम हैं, ये वादियाँ हैं और सुहाना सफर हम जब मिलेंगे तो आपको हरदम सँवारा करेंगे आपसे यदि बिछड़े तो… #आशा   #बेबसी   #लगाव