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यूक्रेन-रूस विभीषिका और भारतीय चिकित्सा प्रबंधन : एक विमर्श

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अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष : एपिसोड - 60 वर्तमान समय में रूस और यूक्रेन के बीच संप्रभुता की लड़ाई चरम पर है। पूरा वैश्विक समुदाय इस अनावश्यक विध्वनकारी  युद्ध से आहत है। समूची वैश्विक संस्थागत इकाई, जो सभी देशों की सहमति से विश्व कल्याण के लिए बनाए गए थे,इस विभीषिका को देखकर किंकर्तव्यविमूढ़ है।  इस विध्वंसक विभीषिका  ने समूचे विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अभी-अभी दुनिया ने पिछले 2 साल से कोरोना महामारी की विभीषिका से अनगिनत स्वजनों को असमय कालकवलित होते देखा है। धरती पर शायद ही कोई ऐसा आदमी हो जिसने अपने परिचितों को इस महामारी में न खोया हो। ये वैश्विक आपदा में मरने वाले लोगों की सही गणना शायद ही किसी भी देश ने सही-सही सार्वजनिक की हो, कारण जो भी हो।  कोरोना महामारी का असर थोड़ा बेअसर हुआ ही था कि रूस यूक्रेन के बीच संपूर्णता की लड़ाई ने प्रलयंकारी रूप ले लिया है। इस विभीषिका ने पूरा मानव समुदाय आहत है। इस युद्ध का परिणाम जिसके पाले आए लेकिन हर रोज मानवता घुट घुट कर मर रहे हैं। यूक्रेन से लाखों लोगों का पलायन जारी है, कारण है युद्ध से अपने स्वजनों...

नारी अस्मिता और मूकदर्शक पुरुष समाज

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अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष  एपिसोड_59 वैदिक युग में नारियों का बड़ा ही पूजनीय स्थान था. विवाह के अवसर पर वधू को आशीर्वाद देने के लिए ऋग्वेद में जो मंत्र है, उसमें वधू से कहा गया है कि सास, ससुर, देवर और ननद की तुम साम्राज्य बनो. स्त्रियां तो गृहस्वामिनी तो होती ही थी, किंतु उनका कार्यक्षेत्र केवल घरों तक ही सीमित नहीं था. वेद की कितनी ही ऋचाऐं नारियों की रची हुई हैं. नारियों के प्रति अन्याय न हो, वे शोक न करें, न वे उदास होने पाए, यह उपदेश मनुस्मृति ने बार-बार दिया है ; शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥ अर्थात : जिस कुल में नारी शोक-मग्न रहती है, उस कुल का शीघ्र ही विनाश हो जाता है. जिस कुल में नारियाँ शोकमग्न नहीं रहती, उस कुल की सर्वदा उन्नति होती है. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:॥ अर्थात : जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं. जहां नारियों की पूजा नहीं होती, वहाँ के सारे कर्म व्यर्थ हैं. वैदिक युग की इस शुभ परंपरा की अनुगूँज हम पुराणों में ...

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_58

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हमारी कविता संग्रह ; “ बता दीजिए हमें ” चाहने वालों से छुप-छुप के क्या छुपाना,, बता दीजिए हमें भी दिलों में क्या है आपके यूँ न खामोश रहकर तड़पाइये मुझे पल-पल हम भी तो कहेंगे आपसे अपने दिल की बातें बता दीजिए हमें… ये वादियाँ, ये सरहदें, ये दुरियाँ-खामोशी भी क्या खूब है आपका हर पल मुस्कुराना भी बता दीजिए हमें… मेरी खामोशी-बेसब्री मेरे सब्र की इंतहा है राज की बातें हमराज से यूँ छुपाना कैसा बता दीजिए हमें… कुछ दिन से चुप हैं,यूँ खामोश बेवजह आप बयां करने से भी दिल का बोझ कम होता है बता दीजिए हमें… मेरे करीब आइए मुझसे कहिए कानों में हौले यूँ गैर सुन लेंगे तो बात पर बात बन जाएगी बता दीजिए हमें… हम हैं, आप हैं  और  हैं  ये शुष्क फिजाये इतने नाराज किस बात पे हैं, राज क्या है बता दीजिए हमें… आपको ही सुनता, आपको  ही  पढ़ता  हूं ये काम छुप-छुप के करके तंग आ गया हूँ बता दीजिए हमें… #गुजारिश   #बेसब्री   #आशाएं

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_57

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हमारी कविता संग्रह; “ राही राहों में ” बढ़ रहे हैं मंजिल की ओर राहें बहुत दलदली हैं शुष्क फिजायें भी गिरने का भी डर रफ्तार तेज करूँ तो पाँव जमीं में धस जाते जैसे कींचड़ में पैर रफ्तार धीमी करूँ तो दिल में बेचैनी भी होती है क्या करूँ बड़ी उलझन है ले लील भले ही राह मुझे लौटना नहीं स्वीकार मुझे  - बड़ी विस्मय की बात ये बड़ी अनोखी है बात ये वादे किये,न फिरूँ पीछे हिम्मत है,न तकूँ पीछे भले हीं कुछ देरी हो, चिंता भी हो पर सफर की शाम मंजिल पे हीं हो जीवन की राहें ऐसी भी कहीं काँटे,कहीं कंकड़ भी सफर में रही अब सोचे क्या मंजिल की धुन,चिंता क्या राही राहों में घबराना ना #आशा   #अपनापन   #बेचैनी   #क्षुधा

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_56

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हमारी कविता संग्रह ; " आपबीती " जल था तरल था अविरल था बहा करता था सबके   अंतर   में  अपनों के अपनेपन में वेदनाओं की ठिठुरती ठंडक ने बर्फ बना डाला अचल, नुकीला सा निर्जन सा पड़ा हुआ किसी कोने में, बागों में पत्तों तले, किसी राही के पैरों तले जाने-अनजाने किसी कोमल पैरों को ठोकर लगी खून बहे, चीख उठा वो पत्थर हो क्या..!! जटिल.! कायर..! स्वार्थी.! सुनता रहा मौन हो मैं मौन पड़ा सुनता रहा सबकुछ जो प्रिय नहीं था आक्रोश थी, दर्द था शब्दों में कसक थी पहले से पीड़ा से भरा था वो भी, हाँ वो भी काश मेरे भी मौन को कोई सुन लेता, पढ़ लेता जीवन मे सब मिलते हैं पढ़े-लिखे विद्वतजन पर मेरे सम्मुख आते हीं अनपढ़ से हो जाते हैं कोई न पढ़ पता मेरे मौन को सचमुच अनपढ़.! भावनाशून्य.! तटस्थ..! उदासीन.!! क्या सच मे मित्रवत- मानवीय भावनाएं नहीं.!! अचंभित था मैं, उनके शब्दों से नहीं उसमे छिपी संवेदनाओं से कितना दर्द छुपा था अपनों के लिए उसके मन में घायल थी हो दिल के हर कोने से सभी तृष्णा को समेटे आकाश की ओर देखती कपकपाते होठ बुदबुदा रहे थे “रहम करो खुदा रहम…” मुझे तरस आई खुद पर खुद के पत्...

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_55

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एक बहुत ही प्यारा सा गजल ; ♥️🌹 वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो “मोमिन ख़ाँ मोमिन” वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो वही या'नी वा'दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो वो जो लुत्फ़ मुझ पे थे बेशतर वो करम कि था मिरे हाल पर मुझे सब है याद ज़रा ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो कभी बैठे सब में जो रू-ब-रू तो इशारतों ही से गुफ़्तुगू वो बयान शौक़ का बरमला तुम्हें याद हो कि न याद हो हुए इत्तिफ़ाक़ से गर बहम तो वफ़ा जताने को दम-ब-दम गिला-ए-मलामत-ए-अक़रिबा तुम्हें याद हो कि न याद हो कोई बात ऐसी अगर हुई कि तुम्हारे जी को बुरी लगी तो बयाँ से पहले ही भूलना तुम्हें याद हो कि न याद हो कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो सुनो ज़िक्र है कई साल का कि किया इक आप ने वा'दा था सो निबाहने का तो ज़िक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो कहा मैं ने बा...

#अभ्युदय_से_चर्मोत्कर्ष #एपिसोड_54

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हमारी कविता संग्रह : उफ्फ मेरा चाँद न जाने कितनों को दीवाना बनाएगा कभी दीवाना हुआ बादल कभी दीवाने हुए कायल उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कितनों को भला तड़पायेगा कभी यह घन में छुपता कभी यह मन में छुपता उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कौन सी पीड़ को छुपाता दिल में कभी इसका आकार घटता-बढ़ता कभी तन पे में काला धब्बा दिखता उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कौन सी अदा है इसके फलक पर कभी इसमें महबूब नजर आए कभी इसमें महबूबा नजर आए उफ्फ मेरा चाँद… न जाने कब तृप्त होंगे मन भी नयन भी कभी कोई चकोर रात भर तकता  कभी दीवाना दिनभर आहें भरता उफ्फ मेरा चाँद… न जाने मेरे चाँद को किसकी नजर लगी कभी अमावस की रात होती है कभी नभ में बदल घुमड़ते हैं उफ्फ मेरा चाँद… न जाने चाँद के चांदनी की शीतलता मिलेगी कभी बरगद के पेड़ों से ओझल होती हैं कभी वो बदल के पीछे छुप जाती है उफ्फ मेरा चाँद…